सतिगुरू पूरण पुरख हमारे मोहे नाम दीजै ठाकुर दातारे।।
हरि नामे मन उपजी प्रीत मैं ना जाणू तेरी परतीत।।
तुमरे हमरे एको सांझ किरपा करो सिमरां नाम।।
दीन दयाल दुख काटो हमारे दर्शन नीच आया दवारे।।
गुरू स्वरूप प्यारी साध संगत जी,
नानक नाम चढ़दी कला तेरे भाणे सरबत दा भला।।
यह मजमून महाराज दर्शन दास जी का उच्चारा हुआ है महाराज दर्शन दास जी हम तमाम जीवों को बड़े प्रेम से समझा रहे हैंः-
सतिगुरू पूरण पुरख हमारे मोहे नाम दीजै ठाकुर दातारे।।
उसको ‘‘ठाकुर’’ कह कर याद किया है। उसको ‘‘पूरण पुरख’’ भी कहा गया है और उससे ‘‘नाम’’ की मांग की है। हे मालिक तेरे नाम से ही, जो हरि का नाम है, परमात्मा का नाम है, मेरे मन में प्रीत पैदा हो सकती है, क्योंकि तेरा नाम अपरम्पार है, तेरा नाम सब दुखों का, रोगों का दारू है, दवा है। तेरा नाम कल्याणकारी है। तेरे नाम से ही हर जीव का उद्धार होता है। तेरे नाम में ही एहसास है। जिन भगतों ने, फकीरों ने तेरा नाम जपा तेरा नाम लेकर कमाई की उन्होंने अपने आपको, अपने मन को शान्त किया या कह लीजिए कि उनका मन शान्त हुआ है और उनके विकार शान्त हुए हैं, समाप्त हुए हैं। उनके अन्दर आध्यात्मिक बल पैदा हुआ है। उनकी आत्मा को जो शक्ति मिली, आत्मा को जो बल मिला, जिससे प्रतीत पैदा हुई है, एहसास पैदा हुआ है जैसा कि हुजूर ने कहा है -
‘‘मैं ना जाणू तेरी परतीत।।’’
‘‘परतीत’’ जैसे कह देते हैं कि तू मेरे पास क्यों आया है भाव किस कारण आया है। मुझे ऐसा एहसास होता है यह एहसास आत्मा का है जिस आत्मा के अन्दर बल नहीं है, शक्ति नहीं है, आत्मा बलवान नहीं है जिसकी, उस जीव को कुछ भी एहसास नहीं होता। जिसका मन बलवान है, मन के कारण उस जीव को संसार की वस्तुओं का, पदार्थों का जो एहसास है बस वही होता है। जीव को अपने आप का भी एहसास नहीं होता है। जब आत्मा बलवान हो जाती है, ताकतवर हो जाती है, आत्मा को अपने आप का भी एहसास हो जाता है, मन का भी एहसास हो जाता है। इस शरीर का भी एहसास हो जाता है, शरीर के अंतर आत्मा कहां है, आत्मा कहां से उठी है और कहां को जा रही है? एहसास होता है, जब जीव ‘‘शबद’’ के साथ ‘‘सुरत’’ को जोड़ता है। तब आत्मा उठती है और ऊपर की ओर बढ़ती है। फिर बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती। जीव को अपने आप पता चलता है कि उसके अन्दर एक जड़ और चेतन है। चेतन अवस्था वह है जहां आत्मा का स्थान है आत्मा जब पांव की तलियों से उठ करके गुदा के अन्दर पहुंचती है तो पता चलता है कि इस शरीर के अंतर ‘‘श्री गणेश’’ का भी वास है। जहां ‘‘कलिंगा- कलिंगा’’ का जाप है। ‘‘कलिंगा-कलिंगा’’ की धुन चलती है। जब जीव इससे ऊपर ‘‘सुरत’’ ले जाता है तो यह एहसास आत्मा को भी होता है। आत्मा को भी पता चलता है कि अतंर ‘‘सारंग-सारंग’’ की भी धुन बजती है। जहां ‘‘नाभि में विष्णु’’ का वास है। और उससे आगे ‘‘ब्रह्मा का वास है त्रिकोटी में’’। वहां की धुन भी ‘‘सांरग-सांरग’’ की है। कंठ में ‘‘शक्ति है’’ उसका एहसास भी इस आत्मा को होता है शबद की सोझी आत्मा का एहसास है। या कह लीजिए कि शबद से सोझी मिली जो शबद, (जो नाम) जीव ने कमाया है उससे ऊपर ‘‘जीव्हा पर सरस्वती है।’’ तो सरस्वती का एहसास भी आत्मा को हुआ है। ‘‘नाक में लक्ष्मी है’’ उसका एहसास भी आत्मा को हुआ है। ‘‘आंखों में उमा व महेश हैं’’ उसका भी एहसास आत्मा को हुआ जब जीव ने कमाई की। उसको कह दिया जाता है कि मुझे ऐसा प्रतीत हुआ है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है। और उससे आगे बढ़ने के लिये ‘‘सूक्षम गुफा’’ से ही जाना पड़ता है। ‘‘सूक्षम गुफा’’ में जब ‘‘रूह या सुरत’’ जायेगी तभी ‘‘दसम द्वार’’ पर पहुंचेगी ‘‘दसम द्वार’’ से पहले ही जब जीव के ऊपर गुरू दयाल हो जाता है। मुर्शिद दयाल हो जाता है उसकी सेवा, उसका सुमिरन देख करके, उसका दान पुण्य देख करके, उसकी मेहनत, उसकी लगन देख करके, उसके शौक को, लगन को, देखते हुए दयालु जब दयाल होता है तो उसको ‘‘साऊंड का वरदान’’ देता है। तब जीव को अन्दर से आवाज आनी शुरू हो जाती है। कौन क्या सवाल लेकर आया है, उस सवाल का जवाब भी उसको मिलना शुरू हो जाता है। अंतर की आवाज सतिगुरू की आवाज है, परमेश्वर की आवाज है। जब उस आवाज को जीव समझ लेता है कि मैं किस अवस्था में हूं, सुन्न अवस्था में हूं,, मैं महासुन्न अवस्था में हूं या मेरा ध्यान कहां है, कौन सी अवस्था में है? उसमें अब आवाज क्या आ रही है? उससे पता चलता है कि यह कष्ट क्या है, यह युक्ति क्या है जिससे यह कष्ट दूर हो सकता है। जिससे मुसीबतों का हल हो सकता है। जब गुरू ने किरपा की तब जाकर यह अवस्था पैदा हुई। और इसके साथ-साथ ही जब गुरू दयाल हो जाता है, मुर्शिद दयाल हो जाता है, वह साथ में सोझी भी दे देता है, दृष्टि भी अपने पास से दे देता है। अपनी ही दृष्टि को अन्दर रख देता है, उससे साथ में नजर आता है। और ‘‘दसम द्वार’’ की जो दृष्टि है जिसको ‘‘शिव नेत्रा, तीसरा तिल’’ कहा जाता है उस ‘‘दृष्टि’’ को पाने के लिये ‘‘दसम द्वार’’ को खोलना पड़ता है। उसके लिये कहा गया है कि ‘‘कुंजी गुरू स्यों पाई’’ जो नौं दरवाजों को बंद करके दसम द्वार खोल लेता है। दसम द्वार का प्रकाश, दसम द्वार की दृष्टि को हासिल करके वो ‘‘सूरमा’’ कहलाता है। उसमें बड़ी दृष्टि है, बड़ा प्रकाश है। जैसा कि एक सूरज के प्रकाश का जीव सामना नहीं कर सकता जबकि वहां जाकर तो ‘‘बारह सूरजों’’ के जितना जीव का अपना प्रकाश हो जाता है। लेकिन वहां तक की मेहनत करने की इच्छा किसी जीव के अंतर नहीं है। जो मेहनत कर सके, जो लोक-भलाई के कार्य कर सके, जो उतना ध्यान कर सके, उतना सुमिरन कर सके, कि अपने आप को तपा लेना है, अपने आप को वश में कर लेना है ंअपनी हौमैं को, अपनी मैं को, अपने अंदर के अहंकार को मार लेना है। अपने अंतर के पांच तत्व जो हैं पांच तत्वों को भी अपने वश में कर लेना हैं, कन्ट्रªोल में कर लेना है। चाहे वह हवा है, हवा जीव के वश में हो जायेगी समझो कि जीव की कमाई जो है वो बहुत आगे जा रही है। कमाई इतनी हो गई है कि पवन देव भी वश में आ रहे हैं। पवन देव भी जीव का साथ निभाने के लिये हाजिर हैं। जीव कह देता है कि यह तूफान रूक जाये तो रूक जाता है। जीव कह देता है कि यह तूफान चल पड़े, तो चल पड़ता है। जीव कह देता है कि हवा चल पडे़ तो हवा चल पड़ती है। जल देवता को भी जीव अपने साथ ले सकता है। जिसको ‘‘खिजर ख्वाजा’’ कहा गया है। इसी तरह ‘‘अग्नि देवता’’ भी साथ चल पड़ता है, अग्नि देवता भी जीव का कहना मानना शुरू कर देता है। जब जीव अग्नि के आगे बैठ कर तप करता है, तपस्या करता है। अग्नि देव के साथ-साथ अपने आपको तपाना पड़ेगा जैसे ‘‘महाराज दर्शन दास जी’’ को हमने ‘‘बटाला’’ में देखा कि ‘‘धूने’’ के अंदर महाराज जी ने अपने चरण रखे हुए है, अग्नि जल रही है और संगत से बातें भी किये जा रहे हैं। और वहां पर जो प्रसाद रखा हुआ है मूंगफली का, वह भी संगत को वितरित किये जा रहे है। बीच-बीच में मौज आती है तो स्वंय भी खा रहे हैं। भाव यह नहीं है कि वह आंखें बंद करके बैठे हैं या नहीं। ध्यान में बैठे हैं आंखें खुली हों, आंखें बंद हों, उससे ध्यान का कोई मतलब नहीं है ‘‘ध्यान’’ तो ‘‘अन्तरआत्मा’’ का है। अंतर के मन का है। अगर ‘‘मन को सुन्न’’ कर लिया है ‘‘ध्यान को सुन्न’’ कर लिया है ‘‘एकाग्र’’ कर लिया है ‘‘दसम द्वार’’ के ऊपर तो समझो कि सारा शरीर सुन्न है, महासुन्न की अवस्था में है और ‘‘दसम द्वार’’ के ऊपर ‘‘महासुन्न’’ की अवस्था में जीव जब खुद बैठा है। तो उसे जीव नहीं, आत्मा नहीं, ‘‘महाआत्मा’’ का रूप कहा जाता है। जिस को महात्मा कहा जाता है। वह जीव अपने पांव को अग्नि के अन्दर रख लेता है तो अग्नि उनको जलाती नहीं है। क्योंकि जिन्होंने अग्नि के आगे तप किया है तपस्या की है अग्नि देवता उनके ऊपर दयाल हो गया है। यह बहुत ही एकाग्रचित से समझने वाली बात है। ऐसे ही धरती माता का है। क्योंकि मिट्टी से यह शरीर बना है, अग्नि तत्व से शरीर बना है, पवन तत्व से बना है, जल तत्व से बना है। मनुष्य के अंदर भी ये चार तत्व होते हैं जैसे चार पाये वाले जानवरों के अंदर चार तत्व हैं। इन तत्वों से शरीर बना है। ‘‘धरती माता’’ भी तब साथ निभाने को तैयार हो जाती है, वश में हो जाती है, सेवक के साथ चल पड़ती है। यह धरती मिट्टी नजर आती है। लेकिन यह एक शरीर के रूप में, पूरे माता के रूप में सामने दिखाई देना शुरू कर देती है। जब कहीं जीव उस धरती के ऊपर तपस्या से भरपूर हो जाता है, तपस्या में लीन होने वाला ही तपस्या से भरपूर होता है। उस समय महासुन्न का ध्यान जीव का बना होता है। उस समय जीव ‘‘धरती’’ से कह देता है कि यहां से रास्ता दे दो तो रास्ता मिल जाता है। धरती फट जाये तो धरती फट जाती है। धरती को जो कह दिया जाता है, धरती माता भी उसी हिसाब से कार्य करती है। और इसके अतिरिक्त ‘‘बुद्धि तत्व’’ है, जो ‘‘पांचवा तत्व’’ दिया गया है ‘‘मनुष्य को,’’ जो जानवरों के पास नहीं है, परिन्दों, कीड़े-मकौड़ों के पास नहीं है, 84 लाख योनियों के पास नहीं है। क्योंकि उनको ‘‘भोग योनि’’ कहा गया है वो अपने पिछले जन्मों के कर्मों को भोगने के लिये धरती पर आते हैं। कुछ ऐसे जीव भी होते हैं दुनिया के अन्दर कि मनुष्य योनि के अन्दर भी जीव ‘‘कर्म भोग’’ रहे हैं। पूर्व जन्मों के कर्मों को भोगते हंै। बहुत सारी दुनिया ऐसी है जो कर्मों का भुगतान करने के लिये इस मनुष्य योनि में आती है। क्योंकि मनुष्य योनि में रहकर बुद्धि से जिसने काम नहीं किया समझो उसके पास बुद्धि पूर्ण नहीं रहती यही कारण है जिसे कहते हैं कि यह कम बुद्धि का मालिक है। इसके पास बुद्धि नहीं है। ये एबनार्मल है इसका दिमाग काम नहीं करता, यह अपाहिज है, यह लूला है, यह लंगड़ा है। भाव बुद्धि साथ नहीं चल रही, बुद्धि के कारण अपाहिज हुआ, क्योंकि बुद्धि से काम नहीं किया गया जो जीव बुद्धि से काम लेकर संसार में पांच तत्वों के हिसाब से चलते हैं पांच तत्वों का लाभ उठाते हैं। जोकि केवल इन्सान के पास ही हैं, वो जीव कर्म कमाई करते हैं। वह जीव सेवा करते हैं, डयूटी करते हैं, चाकरी करते हैं और अपनी आत्मा को बलवान बनाते हैं। जिनकी आत्मा बलवान बन जाती है वह जीव सिमरन में लीन हो जाते हैं, वह बुद्धि से भी ऊपर उठ जाते हैं। पांच तत्वों से ऊपर उठ जाते हैं। पांच तत्व तो उनके साथ ही हैं। जैसे ‘‘श्री गणेश’’ साथ हो गये, ‘‘श्री विष्णु’’ साथ हो गये, ‘‘ब्रह्मा जी’’ साथ हो गये, ‘‘सरस्वती मां’’ साथ चलने लग गई, ‘‘कण्ठ में शक्ति’’ है वह भी साथ निभाने लग गई। ऐसे ही पांच तत्व साथ देना शुरू कर देते हैं। जब इनसे जीव ऊपर उठ जाता है जब लीन हो जाता है ‘‘ध्यान में सुरत’’ लीन हो जाती है। उस समय वहां बुद्धि का भी कोई काम नहीं रह जाता बुद्धि भी नीचे रह जाती है। उस समय आगे केवल ‘‘अन्तर ध्यान’’ है, अन्तर की दृष्टि है, नाम का सिमरन है, नाम की सोझी है, जो जीव के साथ चलती है उसके आगे ‘‘सतगुरू है’’, सतगुरू साथ देने वाला होता है। वह साथ निभाने वाला होता है। जो सतगुरू तक पहुंच गया समझो कि उसकी जिन्दगी का कर्म पूरा हो गया। इससे नीचे तो जीव जैसे कोई भगत, कोई साधू की अवस्था में जा सकता है। लेकिन साधू भी सतगुरू की शरण में जाकर ही बनता है ‘‘नौ दर साधे साध सदाए’’ नौ दर साधने के बाद साधू बन जाता है। साधू अवस्था तो आ गई अब आगे उसका वास कहां होगा, ‘‘दसवें निज घर वासा पाये’’ दसम द्वार में उसका वास होगा। अगर वो आगे तरक्की करेगा तो। अगर वह आध्यात्म कमायेगा तब। अगर वो शक्ति कमायेगा, अगर वो सेवा कमायेगा। यह अपना-अपना भजन सिमरन है, अपनी-अपनी कमाई है। अपना-अपना आध्यात्मिक बल है। जैसे कि पानी के अन्दर पत्थर फैंको उसमें से जल तरंग निकलता है घेरे निकलते हैं। किसी का ‘‘आध्यात्मिक बल’’ पहले घेरे जितना है, किसी का दूसरे घेरे जितना है, किसी का तीसरे घेरे जितना है, किसी का चैथे, किसी का पांचवें जितना है, किसी का जाकर ‘‘सांतवें-आठवें’’ जितना है भाव सबसे आखिरी घेरे जितना बल है। यह आध्यात्मिक बल आम जीवों के अन्दर भी ऐसे ही होता है। साधू संतों के अन्दर भी। हर साधू की ‘‘दृष्टि, आध्यात्मिक बल’’ अलग-अलग है। कमाई पर निर्भर है कि जीव की कमाई कितनी है। कोई जीव सिर्फ आधा घण्टा सिमरन करता है कोई एक घण्टा करता है कोई दो घण्टे करता है। कोई आधे घण्टे के अन्दर अपना ध्यान पूरा लीन कर लेता है। सुन्न, महासुन्न की अवस्था में पहुंच जाता है। ध्यान इतना है कि सिमरन भी चल रहा है और दसम द्वार पर ध्यान भी एकाग्र है। अपने आधे घण्टे के सिमरन, ध्यान के अन्दर वो छः घन्टे की पूर्ति कर जाता है। कई जीव सिमरन तो करते हैं, घण्टा, दो घण्टे भी बैठ जाते हैं तीन-तीन घण्टे भी बैठ जाते हैं लेकिन उनका मन चलायेमान रहता है मन सिमरन में नहीं है, ध्यान बाहर घूम रहा है कभी कहीं, कभी कहीं है। ध्यान विकारों में फंसा हुआ है वह सिमरन नहीं है, उसको तो यह कहते हैं कि मन दसों दिशाओं में घूम रहा है। ‘‘माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहे, मनवा तो दह दिस फिरे यह तो सिमरन नाही।’’ माला तो हाथों में घूम रही है लेकिन मन दसों दिशाओं में घूम रहा है। हुजूर कहते हैं कि ये सिमरन नहीं है। सिमरन वो है जिसमें एकाग्रता बनी हुई है तुम जिसका सिमरन कर रहे हो वह तुम्हारे सामने है। तुम्हारे ध्यान में है। तुम उसकी याद में हो, उसको याद कर रहे हो, उसकी याद में बैठे हो, उसकी याद में सिमरन हो रहा है क्योंकि सिमरन का मतलब ही याद करना है उसकी याद में खो जाना है। जब तक ऐसी अवस्था नहीं आती समझो तब तक सिमरन का आनन्द नहीं आता। नजारा नहीं आता। सिमरन का नजारा लेने के लिये, सरूर लेने के लिये यह करना जरूरी है तभी खुमारी आती है, सरूर आता है। जब जीव अपने आपको सुन्न महासुन्न की अवस्था में लीन कर लेता है। और सतगुरू की याद में जुड़ा रहता है। उस याद में आनन्द है इससे पहले कोई आनन्द नहीं है साधारण जीव सिमरन करता है लेकिन ध्यान संसार में लगा हुआ है। संसार में लगा हुआ ध्यान तो संसार का सिमरन है। परमात्मा का सिमरन नहीं है, सतगुरू का सिमरन नहीं है, तो ‘‘प्रतीत’’ कैसे पता चलेगी। ‘‘एहसास’’ कैसे होगा जब कोई दसम द्वार की अवस्था में चला जाता है, साधू की अवस्था में चला जाता है तो एक दृष्टि की अवस्था में आ जाता है, ‘‘लाईट और साउंड’’ की अवस्था में आ जाता है, कि लाईट से भी नजर आता है, साउंड से भी पता चलता है कौन कहां है? किधर है? किसकी पुकार आ रही है? किसकी फरियाद आ रही है? कौन जीव अब क्या है? पिछले जन्म में क्या था? यह भी पता तब चलता है, जब साधू से ऊपर की अवस्था आ जाती है। दसम द्वार वाली बात आ जाती है तब यह साधू की अवस्था से ऊपर जाकर किसी के पिछले जन्म का पता चलता है उससे पहले नहीं। अपने आपका भी पता चलता है पहले अपने आपका फिर दूसरों का कौन क्या करेगा, आज कौन क्या है और कल को कौन क्या करेगा? जिसे कहते हैं पै्रजैंट, पास्ट, फयूचर। पहले किसी ने क्या किया था, पिछले जन्म में किसी ने क्या किया था अब वह क्या कर रहा है, अगले जन्म में क्या करेगा, अब जो वह कर रहा है आगे जाकर वो क्या बनेगा यह सब ‘‘पै्रजेंट, पास्ट, फयूचर की दृष्टि’’ उन लोगों के पास आती है। जो सुमिरन करते हैं अपने सतगुरू से हर समय चलते फिरते, सोते जागते, हर समय जुड़े रहते हैं और जो उसको हजम करना जानते है जैसे महाराज दर्शन दास जी इतने प्रकार की, इतनी दृष्टि के मालिक, इतनी ताकतों के मालिक, लेकिन फिर भी किसी को महसूस नहीं होने देते थे। बच्चों के साथ बच्चे बन कर रहते थे। बड़ों के साथ बड़े बन कर रहते थे। मां बाप के पुत्रा बन कर रहते थे बच्चों के पिता बनकर रहते थे सबके साथ हंसते-खेलते रहते थे। दोस्तों के दोस्त बनकर रहते थे। साध संगत में गुरू बनकर रहते थे। कोई पीर-फकीर, कोई साधू, कोई भगत या कोई संत आ जाये तो वह पीरों के भी पीर, संतो के भी संत बन कर बैठ जाते थे। फिर अपनी उस अवस्था में चले जाते थे जो उनकी अपनी दसम द्वार की अवस्था थी। परमेश्वर के घर की अवस्था जो जोत उनके साथ काम करती थी फिर उसमें लीन होकर बैठ जाते थे। अन्दरूनी तौर पर तो लीन वह वैसे ही रहते थे लेकिन कभी एहसास नहीं होने देते थे। ध्यान लगा हुआ है, जुड़ा हुआ है।
‘‘हथ कार वल अक्ख यार वल’’
हाथ काम काज मंे हैं बातचीत चल रही है लेकिन अंतर का ध्यान अपने प्रीतम के साथ जुड़ा हुआ है बातचीत यहां चल रही है। लेकिन काम काज इंग्लैंड में संवार रहे हैं, कनाडा में काम कर रहे हैं किसी के। बैठे इंडिया में हैं जीवो ंके साथ बातचीत कर रहे हैं, सवाल-जवाब कर रहे हैं, लेकिन अंतर का ध्यान वहां जुड़ा हुआ है। यह है कमाई। जितनी-जितनी कमाई बढ़ती जायेगी ‘‘सूक्ष्म रूप’’ अपने आप बढ़ता जायेगा। ‘‘सूक्ष्म रूप’’ फिर एक नहीं रहता है एक ‘‘सूक्ष्म गुफा’’ से निकल कर के एक ‘‘सूक्ष्म रूप’’ बन गया फिर वो न जाने कितनी बार निकलते हैं ‘‘सूक्ष्म गुफा’’ से रोजाना, न जाने कितनी बार जिंदा होते है। कितनी बार मरते हैं ‘‘सूक्ष्म गुफा’’ से निकल कर ‘‘दसम द्वार’’ पर पहुंचना समझो बंदे की मौत है। लेकिन संत महात्मा इस क्रिया को न जाने कितनी बार दिन में, रात में करते हैं। ऐसे ही उनके जितने रोम होते है। उतने सूक्षम रूप इमिडियेट, एट ए टाईम प्रकट हो जाते हैं। जब चाहे तब प्रकट हो जाते हैं। जब चाहे तब प्रकट कर लेते हैं लेकिन वो तब, जब किसी की रक्षा का कोई ऐसा समय आ जाये। कोई भगत पुकार रहा हो। पुकार भी पूरे ध्यान में हो, मन चित से पुकार रहे हों। श्रद्धा विश्वास से पुकार रहे हों वहां पर फिर पूर्ण गुरू अपना सूक्ष्म रूप प्रकट करते हैं। नहीं तो वह किसी को एहसास भी नहीं होने देते हैं। हमें याद है कि एक बार चले जा रहे हैं और महाराज दर्शन दास जी कहते हैं कि मुझे पकड़ लेना कहीं मैं गिर न जाऊं क्योंकि मैं यहां नहीं हूं मैं अमृतसर में कोई काम कर रहा हूं। चलते-चलते एकदम से उनको वहां जाना पड़ गया शरीर यहां चल रहा है, पैदल चले जा रहे हैं। लेकिन अंतरआत्मा से वहां पर हैं, सूक्ष्म रूप में, वहां काम कर रहे हैं। ऐसे ही एक दिन डेरे के अंदर वो पूरीयां निकाल रहे थे लेकिन वहीं ध्यान भी एकाग्रचित हुआ और वो इंग्लैंड में पहुंचे हुये हैं। उधर किसी लड़की (जो महाराज जी को मानती थी) ने, गाड़ी का रेडियेटर खोला, ढक्कन खोला तो पानी ने ऐसा उबाला मारा कि सारा पानी मुंह पर पड़ गया, छाले पड़ जाने थे मुंह पर यदि महाराज जी का ध्यान न होता उन्होंने उसको बचाया, रक्षा की। उसके बाद वहां से फोन आया कि ऐसे-ऐसे बात हो गई लेकिन बचाव हो गया है। हुआ कुछ नहीं है महाराज जी ने रक्षा कर ली है। कई सेवकों को भ्रम था कि शायद महाराज जी वैसे ही कह रहे हैं। फोन आने पर सबकी तसल्ली हो गई। इसी को कहते हैं कि गुरू की बात के ऊपर जो जीव भ्रम करते हैं जिनकी तस्सली गुरू से नहीं होती, उनको फिर कहीं भी तस्सली नहीं होती। गुरू वो ताकत है जो हर जगह पर अंग-संग है उसको कहा गया है
‘‘गुरू मेरे संग, सदा है नाले तू ही संग समाई।।’’
वाणी यह भी कहती है
‘‘पुहप मधि जिउ बासु बसतु है मुकर माहि जैसे छाई
तैसे ही हरि बसे निरंतरि, घटि ही खोजहु भाई।।’’
जैसे फूलों के अन्दर खुशबु रहती है शीशे में हमारी परछाई रहती है। ऐसे ही परमात्मा हमारे भीतर रहता है सतगुरू हमारे भीतर रहता है अगर खोजना है तो अंतर जाकर खोजें। बाहर से ध्यान समेट कर अपने अंतर लेकर जायें। अपने भीतर उसको प्रकट करें उसके ‘‘दर्शन दीदार’’ अपने भीतर करें। तब जाकर बात बनती है। उसके लिये ‘‘कर्म कमाई’’ आवश्यक है। अकेला ‘‘सुमिरन’’ ही नहीं सेवा को भी ‘‘मान’’ दिया गया है ‘‘डयूटी’’ को मान दिया गया है। महाराज जी कहा करते थे कि जैसे आम जीव कहते हैं कि एक नम्बर की कमाई से गुजारा नहीं चलता, दो नम्बर की कमाई करनी पड़ती है दो नम्बर की कमाई का कोई न कोई हाथ पल्ला मारना पड़ता है। ऐसे ही सिमरन एक नम्बर की कमाई है। सेवा दो नम्बर की कमाई है। सेवा का फल ज्यादा है सेवा के अन्दर ‘‘जोड़े घर’’ की सेवा का फल बहुत ज्यादा है। जो साध संगत के जोड़ों को साफ करते हैं, संभाल कर रखते हैं उसका फल, और जो ‘‘लंगर घर की सेवा’’, लंगर बनाने की सेवा का फल अधिक है। जितनी श्रद्धा और प्यार से एक मन-चित होकर सिमरन करते हुए लंगर बनायेंगे समझो वो उतनी ही रहमत बख्शिश से भरपूर होते जायेंगे। यह फल होता है लेकिन फल लेने वाले इच्छा नहीं रखते, फल उनको अपने आप मिलता रहता है। वह तो केवल सेवा मे अपनी लगन लगाते हैं। सेवा कर रहे हैं लंगर की, लंगर बरताने की कर रहे हैं, दाल-सब्जी बनाने की कर रहे हैं, फुलका बनाने की कर रहे हैं। अपनी लगन में लगे हुए हैं। साथ साथ सिमरन चल रहा है। वह उनकी लगन है उनका ‘‘शौक’’ है फल देने वाला तो ‘‘दाता’’ है वह साथ ही साथ भरपूर करता रहता है। गुरू साहब को स्नान करवाने का फल ‘‘तीसरी पातशाही’’ ने पाया। तीसरी पातशाही का अपना पै्रक्टीकल कि उन्होंने सारी उमर तीर्थों पर जप-तप किया, स्नान किया, 72 साल की अवस्था तक। लेकिन परमात्मा नहीं मिला, रहमत न मिली। उनके चरणों के अन्दर एक ‘‘पदम’’ था। बैठे हैं कहीं रास्ते में पेड़ के नीचे, छाया में थड़े के ऊपर, वहां कुछ ब्राह्मण भी बैठे थे। ‘‘गुरू अमर दास जी’’ ने सोचा कि चलो खाना खा लेते हैं उन्होंने अपना थैला खोला उसमें से लंगर निकाला। निकालकर पहले ब्राह्मणों को एक-एक रोटी दी, सब्जी दी और फिर स्वंय खाना शुरू किया। ब्राह्मणों ने उनके चरणों को देखा उसमें वह ‘‘पदम’’ दिख रहा था। जिसे देखकर वे खुश हो रहे थे। कि यह तो कोई महान हस्ती है। लेकिन पदम को भी प्रकट करना पड़ता है। वह भी ‘‘गुरू की कृपा’’ से होता है। ‘‘गुरू कृपा’’ से काम करता है। उन्होंने पूछा कि महात्मा जी आप के गुरू कौन हैं? गुरू अमरदास जी कहने लगे कि मेरे गुरू कोई नहीं हैं मैं तो जप-तप करता हूं, तीर्थों पर स्नान करता हूं। पाठ पूजा करता हूं सब ब्राह्मणों ने खाना वापस कर दिया, कहते कि यदि आप का गुरू कोई नहीं है, आपके हाथों से खाना खा करके हम तो नर्कों में चले जायेंगे। हम आपसे खाना नहीं खा सकते। हम दुख मुसीबतें नहीं उठाना चाहते। क्योंकि उस के घर की दात कोई नहीं पा सकता
‘‘बिन गुर दात कोई न पावे लख कोटि जो करम कमावे।।’’
बिना ‘‘गुरू के’’ परमात्मा के घर की कोई भी ‘‘दात’’ कोई भी हासिल नहीं कर सकता। यह जो जीव संसार में पा रहे हैं, जो मिल रहा है जो कहते हैं कि हमें सब कुछ मिला हुआ है कोई भी कमी नहीं है किसी चीज की, यह सांसारिक वस्तुएं हैं सांसारिक पदार्थ हैं। यह जो भाग्य में लिखा हुआ था वह मिला है जो पीछे ‘‘धुर-धाम’’ से लिखा है। वह मिल रहा है लेकिन जो अब कमा रहे हैं दृष्टि को पाने की, प्रकाश को पाने की इच्छा जो रख रहे हैं। परमात्मा को मिलने की इच्छा रख रहे हैं। परमात्मा के घर की रहमत को पाने की सोचते हैं। कोशिश करते हैं। यह गुरू की कृपा दृष्टि के बिना कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। इसलिये गुरू दयाल होना चाहिये। गुरू खुश होना चाहिए। जिसका गुरू खुश नहीं है गुरू दयाल नहीं है सेवक पर, समझो कि वह उसके घर की दात नहीं हासिल कर सकता। गुरू को दयाल करने के लिये, खुश करने के लिये ‘‘दूसरी पातशाही’’ ने गुरू का हर हुक्म माना है। किसी भी हुक्म की अवहेलना नहीं की। हुक्म के लिये इंतजार करते थे कि ये हुक्म करें और मैं मानूं। यही कारण है कि उन्होंने ‘‘अंग से लगाकर अंगद’’ बना दिया। ‘‘कहां भाई लहणा, कहां अंग से लगाकर गुरू अंगद देव नाम दुनिया में प्रचलित कर दिया’’ इसे कहते हैं
‘‘हुक्म मन्ने सो होए परवान तां खसमैं का महल पाईसी।।’’
जिन्होंने हुक्म माना वो परवान हो गये उसके घर में और उसके महल में जिसे महाराज दर्शन दास जी कहते हैं
‘‘गुरू नानक सबहां तो वड्डा तेरा महल चुबारा।
खिमा खुमारी नाम देयो खोजत मन भयो गवारा।।’’
सबसे बड़े सबसे ऊंचे महल चैबारे के अन्दर स्थान मिल जाता है। जिसे सचखण्ड कहा गया है। निरंकार का धाम कहा गया है, निरंकार का घर कहा गया है। उस अवस्था में जीव पहंुच जाता है इसीलिये हुक्म की बात की गई हे। तीसरी पातशाही की बात है वह उस सेवा में लीन रहे सुमिरन में लीन रहे। सेवा और सिमरन के अतिरिक्त कुछ और उनको नजर नहीं आता था।
‘‘सेवा है स्वर्गां दी पौड़ी कर सेवा लख वार
बिना गुरां दी सेवा कीते नई मिलना करतार।।’’
‘‘वेला बैके फेर ना एैंवें तू माला दे मणके
गुरां दी महिमा तकनी है ते तक लै चाकर बणके।।’’
गुरूओं की महिमा को यदि जानना चाहते हो तो चाकर बनना पड़ेगा। जिसे महाराज दर्शन दास जी ने कहा है,
‘‘साहिब अपने की करो चाकरी सभै छोड़ चतुराई जीओ,
आपे अपना खेल करांईंदा सेवक को दे वडियाई जीओ।।’’
यदि इस जन्म में चाकर नहीं बने तो फिर कब बनोगे अगला जन्म पता नहीं कौन सा मिलेगा? यदि इस जन्म में कर्म ना कमाया तो फिर कब कमाओगे? अगले जन्म में पता नहीं कि कर्म कमाने का अवसर मिलना है या नहीं मिलना। पता नहीं जीव से कोई ऐसा कर्म हो जाए कि जीव को पशुओं की योनि में जाना पड़ जाये। कोई भी जीव अपने आप में अहंकार करे कि मैं बहुत अच्छे कर्म करता हूं, बहुत अच्छे कर्म करने वाला हूं। लेकिन जीव कहीं भी गिर सकता है। कहीं भी फिसल सकता है। इसलिये जो जीव गुरू का भय मन में रखते हैं, वही जीव बचकर चलते हैं। किसी शायर ने कहा है,
‘‘सिर धर जो संभल नहीं चलदे ओनां की पंथ मुकाना’’
कि सिर पर गठड़ी रखी हुई है जिम्मेवारी की! लेकिन वो संभल कर, टिका-टिका कर पांव नहीं रखते वो जीव अपना सफर कैसे पूरा करेंगे। वह कैसे मंजिल पर पहुंचेंगे। हर जीव सोचे कि मेरे सिर पर क्या जिम्मेदारी है, उतरदायित्व है? मुझे मनुष्य योनि मिली है इस योनि में मेरे ऊपर ये उतरदायित्व है कि मैंने नाम लेना है मैंने नाम की कमाई करनी है, मैंने तन-मन-धन की सेवा कमानी है, मैंने अपने आपको सतगुरू के काबिल बनाना है। ताकि मेरा सतगुरू मुझ पर दयाल हो जाये और मेरा बेड़ा किनारे लगा दे। मुझे इस भवसागर से पार कर दे। कई जीव केवल सांसारिक बातचीत करना चाहते हैं। जो अपने दुखों के लिये दरबार में आते हैं। अपने कामांे के लिये आते हैं बच्चों के लिये आते हैं, और दुख दर्द कटा कर चले जाते हैं, जिनका ध्यान गुरू दरबार में आकर भी आध्यात्मिक न बना वह तो सिर्फ सांसारिक पदार्थ लेकर चले जाते हैं। महाराज दर्शन दास के समय की बात है डेरे में रहने वाले कम-से-कम साढ़े ंतीन सौ, चार सौ जीव थे, लेकिन आज वो कहां हैं? वहां रहने वाले भी यदि कमाई नहीं कर रहे थे, कर्म नहीं कमा रहे थे, उनको अवसर मिला था लेकिन उन्होंने उस अवसर से लाभ नहीं उठाया। उनका जीवन देख लो वैसे का वैसा बना रहा। गुरू शरण पाने का क्या लाभ हुआ, गुरू से क्या पाया? यह सवाल हमेशा ही उनके सामने रहेगा। पूछने वाले हमेशा पूछेंगे कि तुमने अपने गुरू से क्या पाया? उनकी आत्मा हमेशा ही उनको कोसती रहेगी कि हम गुरू की शरण में रहकर भी कुछ नहीं पा सके। दुनिया भी सवाल करती रहेगी जिन को पता चलेगा कि यह महाराज दर्शन दास जी की शरण में रहे। वह पूछेंगे कि महाराज दर्शन दास जी क्या कहा करते थे, क्या बताया करते थे, क्या दिया करते थे, क्या रहमत करते थे, क्या बख्शिश किया करते थे? यदि वो लोग बतायेंगे कि बहुत सारे लोगों ने उनसे रहमत ली है उन्होंने मुर्दे जिन्दे कर दिये, उन्होंने अधरंग ठीक कर दिये, उन्होंने कैंसर ठीक कर दिये, उन्होंने कई जीवों की टी.बी. ठीक कर दी, अंधों को आंखें दे दी, कई जीवों को उन्होंने रब्बी रहमत दे दी, उन्होंने सचखण्ड के दर्शन करवा दिये, उन्होंने अपने भगतों को इतना जलाल दिया है। तब उन जीवों से दूसरे लोग कहेंगे कि तुम्हारे अन्दर तो जलाल है ही नहीं, तुम्हारा नूर कहां गया? तुम्हारे ऊपर तो नूर नहीं है, इसमें कोई शक नहीं, कोई भ्रम नहीं कि वह पूर्ण गुरू नहीं थे। वो पूर्ण गुरू, पूर्ण पुरख, पूर्ण अवतार थे। लेकिन तुम उनसे कुछ ले नहीं सके। कुछ नहीं पा सके। तुम्हें उन्होंने मौका दिया बार-बार समझाया लेकिन फिर भी तुम उनसे कुछ भी नहीं पा सके। क्योंकि तुम अपने क्रोध की आग को नहीं मिटा सके। क्रोध की अग्नि में तुम अपने ही स्वार्थों में उलझे रहे। उनसे तुम ने क्या पाना था जो उन की दात है वह तो इन तमाम स्वार्थों से ऊपर की बात है। जो चालाकी, होशियारी, चतुराई से मिलने वाली नहीं है। जो भोलेपन में आकर मिलती है।
‘‘कहे कबीर भगत घर पाया, भोले भाव मिले रघुराया।।’’
जो प्रेम अवस्था में मिलती है जिसे यह भी कहते हैं,
‘‘जिन प्रेम कियो तिनही प्रभ पायो।।’’
केवल प्रेम अवस्था, बाहरी बातें नहीं, बाहर की एक्टिंग नहीं केवल अंतर की बात, अंतर का ध्यान चाहिए। तुम्हारे चेहरे क्यों बुझे हुए हैं? नूर, जलाल क्यों नहीं है? कोई उत्तर नहीं है उनके पास? अब भी जिनको अवसर मिला है, गुरू दरबार के अन्दर सेवा करने का, डयूटी करने का, चाकरी करने का, चाहे बाहर से सेवक आते है या डेरे में रहने वाले हैं जिनको यह अवसर मिला है, समझो, सवाल उनके आगे भी खड़े हैं। अगर उन्होंने कुछ नहीं पाया अपने अन्दर, वो तबदीली, वो परिवर्तन ना लाया, जीव के अन्दर प्रतीत अवस्था ना आई एहसास वाली अवस्था को पार ना किया, ऊपर की और अवस्थाएं ग्रहण ना की तो इतिहास में इनके आगे भी सवाल खड़े हैं। क्योंकि दुनिया कुछ भी ना पाने का कारण जानना चाहेगी। यदि दुनिया को यहां से रहमतें मिलती है तो तुम क्यों खाली रह गये तुम क्यों सूखे रह गये? यहां रहमतों की बरसात होती है तुम इसमें स्नान क्यों नहीं कर सके तुम अपने आपको उसमें लीन क्यों नहीं कर सके? क्योंकि तुम्हें गुरू से प्रेम नहीं हुआ, प्रेम करने वाले जीव ही उस बख्शिश को, उस रहमत को पा सकते हैं। जिनको प्रेम हो जाता है उनके लिये बाकि सब कुछ पीछे रह जाता है। उनको केवल वो ही दिखाई देता है, ‘‘तू ही तू, तू ही तू, तू ही तू।।’’ और कुछ नहीं। उस ‘‘तू ही तू’’ की धुन में वो समा जाते हैं। हम सब कहते हैं कि, हमें प्रेम है, लेकिन प्रेम वाली अवस्था बहुत आगे की है हमें केवल बातों-बातों में प्रेम है, वास्तव में प्रेम नहीं है। प्रेम करने वाले ही परमात्मा को पा जाते हैं। प्रेम करने वाले, गुरू का स्वरूप बन जाते हैं। प्रेम करने वाले आंखों में सरूर व नूर ले आते हैं, चेहरे पर जलाल ले आते हैं जो गुरू की असल दात है। जो वो संसार में देने आता है वो जीव उस दात को पा लेते हैं। वह दात केवल प्रेमियों को मिलती है। सबको नहीं मिलती। सबको तो केवल संसार की दातें मिलती है। यह जीव के प्रेम और कमाई की बात है। सोच अपनी-अपनी है हर एक जीव की। अपना-अपना ढंग है, बुद्धि अपनी-अपनी है।
एक बार एक जंगल में पेड़ के नीचे एक व्यक्ति बैठा है जोकि घर से अभी-अभी झगड़ा करके गया है, सोचा कि जंगल में जाऊं तो कुछ शांति मुझे मिल जाये। जंगल में जब पेड़ के नीचे बैठा तो हवा काफी तेज चल रही है पेड़ के पत्ते-टहनियां एक दूसरे से टकरा रहे हैं, अब उस व्यक्ति की सोच देखो, कहता है, कि मैं तो सोच रहा था कि मनुष्य योनि में ही तकरार है, झगड़ा है, आदमी एक-दूसरे से लड़ते हैं, परिवारों में लड़ाई-झगड़ा होता है। यहां तो टहनियां भी एक-दूसरे से टकरा रही हैं। पेड़ भी एक-दूसरे से टक्कर ले रहे हैं। क्या वनस्पत भी झगड़ते हंै, लड़ते हैं? जैसी मन की भावना है वैसी ही सोच होती है। वहीं पर एक जीव और बैठा है वो एक खुशी के माहौल में से आया है। टहलता-टहलता उस पेड़ के नीचे आकर बैठ गया है। क्या देखता है कि पेड़ भी आपस में टकरा रहे हैं, टहनियां, पत्ते भी टकरा रहे है। आवाज आ रही है। उस व्यक्ति को एक संगीत का रस मिल रहा है। उसे पत्तों की आवाज संगीत की तरह महसूस हो रही है। बहुत प्रसन्न हो रहा है सुन कर कि केवल मनुष्य योनि में ही नहीं वनस्पति में भी संगीत है। यह भी संगीत बनाते हैं। यह भी बोलते हैं, यह भी गाते हैं उसे उसमें से संगीत का रस आ रहा है। टहनियों का आपस में टकराना उसे आपस में गले मिलने का आभास दे रहा है। सोच उसकी अपनी है पेड़ वही है। वहीं पर एक लक्कड़हारा बैठा है उसकी अपनी सोच है। सोच रहा है कि यह पेड़ यदि मुझें पांच सौ रूपये का मिल जाये तो मैं इससे चारपाई, फर्नीचर बनाकर कितने ही पैसे कमा सकता हूं। वह अपना हिसाब-किताब लगा रहा है। धन कमाने का। वहां पर एक साधू बैठा है वह देखता है कि यह पत्ता इस पेड़ से टूटा है, हवा इसको उड़ाकर ले गई है और वह उड़ता-उड़ता ना जाने कितनी दूर निकल गया है। वह दोबारा इस पेड़ को लग नहीं पायेगा, सोच रहा है कि ऐसे ही ‘‘परमात्मा से जीव’’ न जाने कब से बिछड़े है इस पत्ते की तरह आगे से आगे उड़ते जा रहे हैं काल का तूफान इनको उड़ाता जा रहा है। कोई भी वापस मुड़ने के लिये नहीं सोचता। पत्ते की तरह ही जीवों की वापसी नहीं हो रही। सब आगे से आगे निकलते जा रहे हैं। वहां एक वैज्ञानिक भी बैठा है वह देखता है कि ऊपर से एक फल धरती पर गिरा है इसका अर्थ है कि धरती हर वस्तु को अपनी ओर खींचती है यह फल टूट कर ऊपर की ओर भी जा सकता था। लेकिन नीचे ही क्यों आया है? यह सब धरती के गुरूत्वाकर्षण बल के कारण है, नहीं तो सब वस्तुऐं ऊपर की ओर उड़कर भी जा सकती हैं। हर एक व्यक्ति की अपनी सोच विचार है इसलिये हम जितने भी जीव हैं हमारी सबकी अपनी सोच है। लेकिन हुजूर कहते हैं कि यदि जीव साध संगत में आ गये हैं नाम ले लिया है तो उनकी सोच गुरू वाली सोच होनी चाहिए। गुरू की सोच को जो जीव ग्रहण करके चल पड़ते हैं उनका ही पार उतारा हैं वह भव सागर से पार हो जाते हैं। लेकिन यदि साध संगत मंे आकर भी जीव अपनी-अपनी सोच रखते हैं, अपनी सोच में चलते हैं तो समझो कि नाम लिया या ना लिया वो जुड़े या ना जुड़ेे एक ही बात है। गुरू सबका ध्यान रखने वाला है। हमने कल सत्संग में एक लड़की की बात बताई जिसका नाम पियूष है। वह कैसे गुरू की सोच मे डूबी कि उसकी परीक्षा भी गुरू ने जाकर दे दी। क्योंकि वह गुरू की लगन में लग गई जिसके अन्दर गुरू की याद, गुरू की लगन पैदा हो जाये। गुरू के कार्य में जो लग जाये समझो उसके कारज गुरू रास करता है। गुरू कोई शरीर नहीं है, गुरू एक जोत है, जो कि अपना एक दूसरा सूक्ष्म रूप धारण करके कभी भी कहीं भी जाकर कारज रास करने वाला है। इसीलिये गुरू की महिमा कबीर साहिब भी करते हैं,
‘‘ गुरू गोवन्द दोऊ खड़े काके लागू पांय
बलिहारी गुरू आपने जिन गोबिन्द दियो मिलाय।।’’
मैं अपने गुरू से बलिहार जाता हूं जिसने मुझे परमात्मा से मिला दिया परमात्मा के दर्शन करवा दिये। दूसरी पातशाही भी यही कहते हैं,
‘‘बलिहारी गुर आपणे दिउहाड़ी सदवार
जिनि माणस ते देवते कीए करत ना लागी वार।।’’
‘‘जे सउ चंदा उगवहि सूरज चड़हि हजार।
एते चानण होदिआं गुर बिनु घोर अंधार।।’’
बाहर चाहे कितनी भी रौशनी हो कितने भी चन्द्रमा चढ़ जायें, सूर्य चढ़ जायें लेकिन हमारे अंतर में अंधकार ही अंधकार है। अंतर की रौशनी के लिये गुरू चाहिये, भीतर केवल गुरू ही रौशनी कर सकता हैं। अंतर की अज्ञानता को गुरू मिटाने वाला है। इसलिये गुरू की आवश्यकता है। इसीलिये दूसरी पातशाही ने फर्मान किया है, ‘‘बलिहारी गुर आपणें’’ अपने गुरू से बलिहार जाता हूं। जिन्होंने नाम लिया है, कहीं से भी लिया है, वो जीव नाम की कमाई करें तन-मन-धन की सेवा करें और मन-चित से अपने आपको गुरू को समर्पित कर दें। भाव अपना मन अपने गुरू के चरणों में समर्पित कर दें। जिसे वाणी कहती है,
‘‘ मन वेचै सतिगुर के पास तिस सेवक के कारज रास’’।
ताकि उन जीवों के सब कारज गुरू रास कर सके। गुरू दरबार में आने का लाभ तभी है उसके नाम की वडियाई करके उसके घर की बख्शिश पायें यह हुजूर का संदेश है इसके अनुसार अपना जीवन बनाओ मालिक सब पर कृपा करे। इसके साथ ही
नानक नाम चढ़दी कला तेरे भाणे सरबत दा भला।।

